वो शायर जो कहता था हिंदुस्तान में सिर्फ ढाई लोगों को अंग्रेजी आती है

नेहरू के करीबी दोस्त फिराक गोरखपुरी, अंग्रेजी के विद्वान और उर्दू के शायर

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“आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हम असरों
जब भी उनको ध्यान आएगा, तुमने फ़िराक़ को देखा है”

इस तरह का अपनी ही तारीफ में इतना जबरदस्त, अकड़ वाला शेर लिखने की हिमाकत करने वाले शायर थे फिराक गोरखपुरी (Firaq Gorakhpuri) जब मैंने पहली बार यह शेर पढ़ा तो मुझे यकीन नहीं हुआ कि कोई शायर अपनी तारीफ में, अपने लिए इस तरह का शेर लिख सकता है। लेकिन यह बात सच है कि आज वह लोग खुद पर गर्व महसूस करते हैं कि जिन लोगों ने फिराक साहब को सामने बैठकर मुशायरे में सुना था या उन्हें देखा था।

28 अगस्त 1896 में गोरखपुर में जन्मे फिराक गोरखपुरी का यूं तो असली नाम ‘रघुपति सहाय’ था। लेकिन शायरी की दुनिया में उनका नाम फिराक गोरखपुरी ही मशहूर हुआ। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय (Allahabad University) में अंग्रेजी के अध्यापक थे। इसके इतर हिंदी, उर्दू, अरबी इत्यादि में उनकी पकड़ बहुत ही मजबूत थी। वो कहते थे कि “हिंदुस्तान में सिर्फ ढाई लोगों को अंग्रेजी आती है, एक खुद मैं, एक डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन (Dr. Sarvapalli Radhakrishnan) और आधी जवाहरलाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) को।

फिराक गोरखपुरी को कई विद्वान और बड़े शायर मीर और गालिब के बाद तीसरा सबसे बड़ा शायर मानते हैं, मशहूर शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली (Nida Fazli) भी उनको मीर और ग़ालिब के बाद सबसे बडा शायर मानते हैं, जिन्होंने एक पीढ़ी की और अगली पीढ़ी की शायरी की। फिराक गोरखपुरी ने अपनी शायरी में आम बोलचाल के शब्द डालना भी शुरू किया और उन्हें नई ग़ज़ल का सबसे चमकदार शायर माना जाता है।

फ़िराक़ साहब के किस्से

फिराक गोरखपुरी भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के करीबी दोस्त थे। उनसे जुड़ा एक किस्सा है कि “एक बार जब प्रधानमंत्री बनने के बाद नेहरू इलाहाबाद आए तो फिराक गोरखपुरी उनसे मिलने पहुंचे। रिसेप्शनिस्ट के नाम पूछने पर उन्होंने रघुपति सहाय बताया, रिसेप्शनिस्ट ने उनका नाम नेहरू के पास चिट में आर सहाय लिखकर भेजा। जब 15 मिनट तक नेहरू ने उन्हें अंदर नहीं बुलाया तो फिराक साहब बिगड़ गए और रिसेप्सनिस्ट को भला-बुरा सुनाने लगे। आवाज सुनकर नेहरू बाहर आए तो देखा कि यहां तो फिराक गोरखपुरी आए हैं, नेहरू ने कहा कि आप बाहर क्या कर रहे हैं अंदर क्यों नहीं आए, तो फ़िराक़ साहब ने कहा कि मैं इतनी देर से इंतजार कर रहा हूं आपने बुलाया नहीं। इतने में नेहरू बोले मेरे पास जो चिट आयी थी उसमें आर सहाय लिखा था, मैं तुम्हें 30 सालों से रघुपति के नाम से जानता हूं मुझे क्या पता ये आर सहाय कौन है। अंदर जाने के बाद नेहरू ने फिराक साहब से पूछा नाराज हो क्या?
तब फ़िराक़ साहब ने एक शेर से जवाब दिया –

“तुम मुख़ातिब भी हो, क़रीब भी हो
तुमको देखें कि तुम से बात करें”

इसी तरह एक बार पंडित नेहरू इलाहाबाद विश्वविद्यालय सीनेट हॉल में भाषण दे रहे थे। नेहरू अक्सर अपने भाषणों में इतिहास की घटनाओं का जिक्र करते थे, उस दिन वहां पर नेहरू से एक तथ्यात्मक गलती हो गई तो, वहां मौजूद ईश्वरी प्रसाद जो कि इतिहास के अच्छे ज्ञाता थे उन्होंने खड़े होकर नेहरू की भूल सुधारने की कोशिश करनी चाही। तभी दूर से फ़िराक़ साहब खड़े हुए और उन्होंने पूरी आवाज में बोला “शिट डाउन ईश्वरी यू आर क्रैमर ऑफ हिस्ट्री, एंड ही इस क्रिएटर ऑफ हिस्ट्री”

पुरस्कार व सम्मान

फिराक गोरखपुरी को भारत में साहित्य के क्षेत्र के सबसे बड़े पुरस्कार ज्ञानपीठ (1969) व साहित्य अकैडमी (1970) पुरस्कार मिले थे। साथ ही फिराक गोरखपुरी को साहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान देने के लिए भारत का तृतीय सर्वोच्च पुरस्कार पद्मभूषण (1968) भी मिला।

फ़िराक़ गोरखपुरी के कुछ मशहूर शेर

“बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं”

“एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं”

“आये थे हंसते खेलते मयखाने में फ़िराक़
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गये”

“आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ
उफ़ ले गई है मुझ को मोहब्बत कहाँ कहाँ”

“ये नर्म नर्म हवा झिलमिला रहे हैं चराग़
तेरे ख़याल की ख़ुशबू से बस रहे हैं दिमाग़”

“खो दिया तुमको तो हम पूछते फिरते हैं यही
जिसकी तकदीर बिगड़ जाए वो करता क्या है”

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