जब जंगल बचाने के लिए पेड़ों से लिपट गयी थी स्थानीय महिलाएं

गौरा देवी के नेतृत्व में जुटी थी महिलाएं और बाद में पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा भी जुड़े आंदोलन से।

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चिपको आंदोलन : एक अनोखा आंदोलन

 

दशकूप समावापी , दशवापीसमो हृद:।
दशहृदसमो पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुम: ।।

अर्थात- दस कुएँ के बराबर होती है एक बावड़ी, दस बावडी के बराबर एक सरोवर, दस सरोवर के समान एक पुत्र और दस पुत्रो के समान एक वृक्ष का महत्त्व होता है।

मत्स्य पुराण में उल्लेखित इस श्लोक के मायने हमारे समाज और परिवेश के लिए क्या हैं उसे चरितार्थ किया था अब से 50 साल पहले उत्तराखंड के चमोली जिले के रैणी गांव में, जहां सरकार की तरफ से पेड़ काटने आये लोगों से अपने जंगल को बचाने के लिए स्थानीय लोग पेड़ों से चिपक गए।

प्रकृति जिसे अनेकों संस्कृतियों में परम पूजनीय माना गया है, अथवा प्रकृति एवं इससे प्राप्त संसाधनों का संरक्षण मानव का परम कर्तव्य माना गया है। इसी परम कर्तव्य को पुनः जागृत करता हुआ एक आंदोलन था चिपको आंदोलन। यह आंदोलन एक प्रकार का सत्याग्रह था जो पर्यावरण रक्षा के लिए मिसाल बन गया।

एक ऐसा आंदोलन जिसने 1970 में अपना नाम प्राकृतिक संरक्षण के पन्नों में सदा के लिए अमर कर दिया। इस आंदोलन की शुरुआत हुई चमोली (chamoli) जिले के रैणी गांव (Raini Village) से जहां गौरा देवी (Gaura Devi) अथवा चंडी प्रसाद भट्ट (Chandi prasad Bhatt) ने इस आंदोलन की शुरुआत की और उसके बाद सुंदरलाल बहुगुणा (Sunderlal Bahuguna) ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया।

1970 में सरकार की तरफ से एक विकास योजना के तहत लगभग ढाई हजार पेड़ काटने का एक आदेश जारी किया गया जिसके विरोध में रैणी गांव की महिलाओं ने पेड़ों से लिपट कर इन्हें ना काटने का अनुरोध किया। पहाड़ी महिलाओं का प्रकृति के प्रति समर्पण अथवा जोश देखकर उन मजदूरों को खाली हाथ लौटना पड़ा। जैसा कि चिपको आंदोलन (Chipko Movement) का घोषवाक्य भी बताता है –

क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।

यह आंदोलन एक उदाहरण है उस संस्कृति का जहां वृक्ष की गुणवत्ता तथा अन्य विशेषताओं को सर्वोपरि माना गया है । यह आंदोलन है उन अनेक पहाड़ी भाई बहनों का जिनका जीवन इन जंगलों पर पूर्णतः निर्भर है अथवा यह जंगल ही उनके रहने खाने का साधन है। जो जंगल को ही अपना निवास मानते हैं और इन जंगलों में पलने वाले जीवों को अपना मानते हैं।

माना कि जंगल घना है,
पेड़ माटी से सना है।

देखने को कुछ एकड़ में,
स्तब्ध ये तरु खड़े हैं,
कुछ छोटे कुछ मध्यम,
कुछ बड़े कुछ पड़े हैं।
पर लाखों पंछियों का,
आसरा बस एक तना है,
माना कि जंगल घना है,
पेड़ माटी से सना है।।

– Sudhan Singh Kaintura

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