उत्तर प्रदेश का पहला मुख्यमंत्री जो चाय-नाश्ते का भी बिल पास नहीं करता था

अल्मोड़ा जिले में जन्मे भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत हिंदी के उत्थान के लिए कार्य करने के संदर्भ में भी जाने जाते हैं

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उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और 1955 से 1961 तक भारत के गृह मंत्री रहे भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत एक सादगी पसंद इंसान थे। कभी उन्होंने लोगों की समस्याओं के लिए खुद फ़ावड़ा उठा लिया तो कभी अपने ही साथी मंत्रियों को बोल दिया कि वह किसी भी सभा में किए गए चाय नाश्ते में नाश्ते का बिल पास नहीं करेंगे।

मौजूदा उत्तराखंड के अल्मोड़ा(Almora) जिले में 10 सितंबर 1887 को जन्मे पंडित गोविंद बल्लभ पंत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय राजनीति का एक बड़ा नाम और बड़ा चेहरा हैं। किसी पहाड़ी मूल के व्यक्ति का उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का पहला मुख्यमंत्री बन जाना यह उस समय के लिए आम बात नहीं थी जब उत्तर प्रदेश में एक से एक बड़े नेता हुआ करते थे। पंडित नेहरू (Pandit Nehru), महामना मदन मोहन मालवीय (Mahamana madan mohan malviya) महात्मा गांधी के करीबी रहे गोविंद बल्लभ पंत अपनी सादगी और अपने उसूलों के लिए जाने जाते हैं।

गांधी के करीबी

पेशे से वकील पंडित गोविंद बल्लभ पंत 1921 में महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के आह्वान पर राजनीति में खुले तौर पर उतर आए और असहयोग आंदोलन (Non Cooperation Movement) में गांधी के साथ चले। 9 अगस्त 1925 को जब काकोरी कांड की घटना हुई है और कुछ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अंग्रेजी सरकार का सरकारी खजाना लूटा तब स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की पैरवी करने वाले वकीलों में पंडित गोविंद बल्लभ पंत भी अग्रणी तौर पर थे, और अपनी पूरी कोशिश उनके बचाव में लगाई थी।

जज से ही भिड़ गए

गोविंद बल्लभ पंत की वकालत के बारे में एक किस्सा मशहूर है कि, एक बार अल्मोड़ा (Almora) की अदालत में जज से उनकी बहस हो गई थी और जज ने गोविंद बल्लभ पंत को अदालत ना आने की सलाह दी। इसके जवाब में पलटकर पंत ने खुद ही कहा कि आज से तुम्हारी अदालत में मैं खुद ही नहीं आऊंगा। 1914 में पंत ने काशीपुर (Kashipur) में प्रेमसभा (Premsabha) नाम की एक संस्था का गठन किया। जो साहित्यिक, शिक्षा और सांस्कृतिक कार्यों के प्रसार को समर्पित थी। इस संस्था का कार्य इतना उत्कृष्ट साबित हुआ कि अंग्रेज वहां से चले गए।

हिंदी भाषा के लिए कार्य

हिंदी भाषा को आमजन की भाषा और कामकाज की भाषा बनाने के पीछे सबसे ज्यादा जोर पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने ही दिया था। महात्मा गांधी का कहना था कि अपनी भाषा के बिना कोई भी समाज गूंगा बहरा है, पंत ने भी इसी बात का अनुसरण कर भाषा के हित में कार्य किया। गोविंद बल्लभ पंत ने ही भाषा आधारित राज्य गठन का सुझाव दिया था, उस वक्त लोगों ने कहा था कि यह देश को तोड़ेगा लेकिन भाषाओं के आधार पर राज्यों का विभाजन करना उनकी एक दूरदृष्टि का परिणाम है।

चाय नाश्ते के खर्चा

गोविंद बल्लभ पंत अपने उसूलों के इतने पक्के थे कि एक बार किसी सरकारी बैठक में चाय नाश्ते का इंतजाम था और जब उनके पास बिल लाया गया तो उस पर 6 रुपये बारह आने लिखा था। तभी पंत ने कहा कि सरकारी बैठकों में सिर्फ चाय का इंतजाम होना चाहिए नाश्ते का इंतजाम के लिए आयोजक को खुद पैसे देने चाहिए। इसलिए उन्होंने उस बिल को पास करने से मना कर दिया था।

कुली बेगार का विरोध

अंग्रेज शासन के दौरान एक ‘कुली बेगार प्रथा’ (Kuli begaar Pratha) बहुत कुख्यात थी, जिसमें लोगों को अंग्रेजों का सामान मुफ्त में ढोना पड़ता था। इसके विरोध में पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने संघर्ष किया और कुली बेगार प्रथा को खत्म कराने की दिशा में एक अहम किरदार निभाया। कृषि के क्षेत्र में भी गोविंद बल्लभ पंत का योगदान अद्वितीय है। उत्तराखंड के पंतनगर में उनके नाम से ही है पंडित गोविंद बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय (GBPUAT) की स्थापना की गई।

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