ज़िंदगी को अल्फाज़ देने वाले गुलज़ार का जन्मदिन आज

जिंदगी के हर लम्हें को, हर अहसास को शब्दों में पिरोने वाले शायर

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शब्दों से खेलना, विचित्र कल्पनाओं में शब्दों को बुनना और फिर उन शब्दों से कमाल की जादूगरी करना…और सबके दिलो दिमाग पर हमेशा हमेशा के लिए कब्ज़ा कर लेना…यही तो है गुलज़ार हो जाना…जो अब तक ना कोई हो पाया है और शायद ना कोई हो पाएगा।

हर अहसास को अल्फाज़ देना सिर्फ गुलजार ही कर सकते हैं। गुलजार का आज यानी 18 अगस्त को जन्मदिन है, लेकिन गुलज़ार सिर्फ अपने जन्मदिन पर याद किये जाने वाले शख्सियतों में से नहीं है। वो जिंदगी के हर लम्हें को, हर अहसास को शब्दों में पिरोने वाले शायर है। अगर हम ये कहें कि अल्फाजों पर उनकी मल्कियत है तो गलत नहीं होगा।

हवा के सींग न पकड़ों खदेड़ देती है,
जमीं से पेड़ों के टांके उधेड़ देती है।

ये पंक्तियां पढ़ने के बाद, क्या अब भी आपको बताना पड़ेगा कि ये किसने लिखा है। गुलज़ार की कल्पना कुछ ऐसी होती है कि जब वो उन्हें अपने शब्द देते हैं और फिर उन पंक्तियों के नीचे अपना नाम नहीं लिखते फिर भी लोग झट से पहचान जाते हैं कि ये तो गुलजार ही लिख सकते हैं कोई और नहीं।

याद है इक दिन
मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे
सिगरेट की डिबिया पर तुमने
एक स्केच बनाया था
कर देखो
उस पौधे पर फूल आया है!
गुलज़ार से जुड़ी खास बातें

जानेमाने शायर गुलजार का असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा है। उनका जन्म 18 अगस्त, 1934 को झेलम जिले के दीना गांव में हुआ था जो अब पाकिस्‍तान में है। वे फिल्मों में आने से पहले गैराज मकेनिक का काम किया करते थे। गुलजार कम उम्र में ही लिखने लगे थे, लेकिन उनके पिता को यह पसंद नहीं था, लेकिन उन्होंने लिखना जारी रखा और एक दिन अपनी मेहनत के दम पर बॉलीवुड का बड़ा नाम बन गए।

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैं ने!
काले घर में सूरज रख के
तुमने शायद सोचा था मेरे सब मोहरे पिट जाएँगे
मैं ने एक चराग़ जला कर
अपना रस्ता खोल लिया

गुलज़ार से जुड़ी कुछ खास बातें

  • गुलजार 20 फिल्मफेयर, 5 राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम कर चुके हैं। 2010 में उन्हें स्लमडॉग मिलेनेयर के गाने ‘जय हो’ के लिए ग्रैमी अवार्ड से नवाजा गया था। उन्हें 2013 के दादा साहेब फालके सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।
  • गुलजार अपने कॉलेज के दिनों से ही सफेद कपड़े पहन रहे हैं।
  • उन्होंने बिमल रॉय के साथ असिस्टेंट का काम किया। एस.डी. बर्मन की ‘बंदिनी’ से बतौर गीतकार शुरुआत की उनका पहला गाना था, ‘मोरा गोरा अंग…’
  • बतौर डायरेक्टर गुलजार की पहली फिल्म ‘मेरे अपने’ (1971) थी, जो बंगाली फिल्म ‘अपनाजन’ की रीमेक थी।
  • गुलजार की अधिकतर फिल्मों में फ्लैशबैक देखने को मिलता है, उनका मानना है कि अतीत को दिखाए बिना फिल्म पूरी नहीं हो सकती। इसकी झलक, ‘किताब’, ‘आंधी’ और ‘इजाजत’ जैसी फिल्मों में देखने को मिलती है।
  • गुलजार उर्दू में लिखना पसंद करते हैं।
  • गुलजार ने 1973 की फिल्म ‘कोशिश’ के लिए साइन लैंग्वेज सीखी थी क्योंकि ये फिल्म मूक-वधिर विषय पर थी। जिसमें संजीव कुमार और जया भादुड़ी थे।
  • 1971 में उन्होंने ‘गुड्डी’ फिल्म के लिए ‘हमको मन की शक्ति’ देना गाना लिखा। ये गाना स्कूलों मे प्रार्थना के तौर गाया जाता है।
  • उन्होंने फिल्म हू तू तू’ के फ्लॉप होने के बाद फिल्में बनानी बंद कर दीं।
देखो आहिस्ता चलो और भी आहिस्ता ज़रा
देखना सोच सँभल कर ज़रा पाँव रखना
ज़ोर से बज उठे पैरों की आवाज़ कहीं
काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में
ख़्वाब टूटे कोई जाग जाए देखो
जाग जाएगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा

फिल्मी गाने लिखने में नहीं थी दिलचस्पी

गुलजार गीतकार से पहले एक शायर हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि शायरी उनका पहला प्यार है। उन्होंने जब अपने करियर का पहला फ़िल्मी गीत ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ लिखा तब वो फ़िल्मों के लिए गाने लिखने को लेकर ज़्यादा उत्सुक नहीं थे। हालांकि इसके बावजूद उन्हें गाने लिखने का मौका मिलता रहा और वो गाने लिखते चले गए।

जब गुलज़ार की वजह से खत्म हुई बर्मन दा से लता की नाराज़गी

कई बड़ी हस्तियों के साथ काम किया है गुलजार ने। इन्हीं में से एक लता मंगेशकर हैं। लता जी और गुलजार से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प किस्सा है। लता जी ने एक इंटरव्यू में बताया कि म्युजिक डायरेक्टर एसडी बर्मन के साथ उनका झगड़ा चल रहा था। इस बीच एक दिन उनका फ़ोन आया कि एक नया लड़का आया है उसने फ़िल्म ‘बंदिनी’ के लिए ये गाना लिखा है ‘मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे’। मुझे ये गाना इतना पसंद आया कि मैं गाने के लिए मान गई।” इस तरह गुलजार की वजह से लता और बर्मन दा के बीच फिर से बातचीत शुरू हो गई।

पहली नज़र की मोहब्बत. 44 साल का अकेलापन

उस वक्त की फेमस अभिनेत्री राखी से गुलज़ार को पहली नजर में मोहब्बत हो गई थी। उनकी शादी 15 साल की उम्र में एक बांग्ला फिल्मकार से हो चुकी थी। लेकिन ये शादी लंबे समय तक नहीं चली और शादी टूट गई। बॉलीवुड की एक पार्टी में मिली राखी को पहली बार में गुलजार दिल दे बैठे। दोनों ने 15 मई 1973 में शादी कर ली।

दोनों की आपसी लड़ाई के चलते गुलजार राखी के साथ ज्यादा समय तक नहीं रहे और उन्होंने एक साल भी राखी से तलाक ले लिया। शादी के बाद गुलजार के कहने पर राखी ने फिल्मों से दूरी बना ली थी, लेकिन डिवोर्स के बाद उन्होंने एक बार फिल यश चोपड़ा की फिल्म ‘कभी-कभी’ से अपने करियर की शुरुआत की। बीते 44 सालों से गुलजार अकेले ही रह रहे हैं। बता दें कि दोनों की एक बेटी मेघना गुलजार भी है।

रात चुप-चाप दबे पांव चले जाती है
रात ख़ामोश है रोती नहीं हंसती भी नहीं
कांच का नीला सा गुम्बद है उड़ा जाता है
ख़ाली ख़ाली कोई बजरा सा बहा जाता है

गुलज़ार के लिए जितना भी लिखा जाए वो कम है क्योंकि गुलज़ार तो खुद अल्फाजों के बाजीगर हैं। उन्हें अल्फाजों में पिरोना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

 

 

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