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वो महाकवि जिसकी कविताओं के बिना कोई आंदोलन पूरा नहीं होता

सिर्फ 42 की उम्र में दुनिया से विदा लेने वाले दुष्यंत कुमार आज भी हैं आंदोलन की आवाज

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“हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
तेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए”

दुष्यंत Dushyant Kumar की यह पंक्तियां किसी के हृदय में भी इंकलाबी ज्वार पैदा करने के लिए काफी हैं। वो ग़ज़लकार जिसने गजलों की दुनिया में हिंदी भाषा (Hindi Ghazal) की एंट्री कराई और अपनी भाषा हिंदी में गजलें कहना शुरू किया। कहते हैं दुष्यंत की रोमांटिक गजलों में भी एक इंकलाबी स्वर सुनने को मिलता था। 1 सितंबर 1933 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर (Bijnor) जिले के राजपुर नवादा गांव में जन्मे दुष्यंत कक्षा 10 से ही कविताएं करने लगे थे। उच्च शिक्षा के लिए दुष्यंत इलाहाबाद विश्वविद्यालय गए और बाद में B.Ed करके आकाशवाणी (Akashavani) से जुड़े।

दुष्यंत कुमार त्यागी जो कि शुरुआती दौर में दुष्यंत कुमार परदेसी के नाम से लिखा करते थे, उन्होंने अपनी कर्मभूमि के रूप में मध्यप्रदेश के भोपाल (Bhopal) को चुना। वहां वो संस्कृति मंत्रालय के भाषा विभाग में काम करते थे। दुष्यंत के समय में ताज भोपाली (Taj Bhopali) और कैफ़ भोपाली (Kaif Bhopali) जैसे शायरों का सिक्का चलता था, वहीं हिंदी कविता में मुक्तिबोध, अज्ञेय जैसे कवियों की कठिन कविताएं थी। उस समय सरल भाषा में लोगों की आवाज बनने का जो काम किया वह दुष्यंत ने किया, उनकी कई पंक्तियां आज भी मुहावरे की तरह प्रयोग होती हैं।

सरकार की खिलाफत

दुष्यंत की पहचान उनकी मुखरता है। कांग्रेस सरकार (Congress Government) के खिलाफ वह हमेशा ही लिखते रहे थे उनकी पंक्ति “कैसे आसमां में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो” ने न जाने कितने लोगों को आंदोलनों के लिए प्रेरित किया और उन्हें विश्वास दिलाया कि पूरे लगन से कुछ किया जाए तो कुछ भी असंभव नहीं है। इमरजेंसी के दौरान भी वो लगातार सरकार के विरोध में लिखते रहे, हालांकि इस बात का उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ा और उनको नौकरी से निकाला गया। एक शायर सिर्फ अपनी पीढ़ी के लिए नहीं लिखता इसका सबसे बड़ा उदाहरण है दुष्यंत, उनका लिखा आज भी सड़कों (Voice Of protest) पर गाया जाता है।

कम उम्र में निधन

मात्र 42 वर्ष की अल्पायु में दुष्यंत ने जो ओहदा पाया वह आसान नहीं होता। कहते हैं दुष्यंत अपनी पत्नी को जब कोई रोमांटिक कविता सुनाते तो उसमें भी उनकी बाकी गजलों की तरह इंकलाबी स्वर सुनाई देता था। उनकी लिखी पंक्ति “तू किसी रेल सी गुजरती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं” आज भी अलग अलग अंदाज में सुनी जाती है। 30 दिसम्बर 1975 को हार्टअटैक से हिंदी गजलों के अग्रणी शायर का निधन हो गया। उसी वर्ष उनकी पुस्तक ‘साये में धूप आयी थी।

 

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