वरुणा की त्रासदी: गंगा के लिए चुनौती

वाराणसी की वरुणा अब बारिश के पानी से अपना अस्तित्व बचाती दिख रही है।

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वाराणसी। फूलपुर के पास मैलहन झील से निकलकर 202 किमी. की यात्रा करके वाराणसी के आदिकेशव घाट पर गंगा से मिलती है। इसी नदी ने वाराणसी को नाम दिया। इस पुराने शहर को जिन दो नदियों वरुणा और असि के नाम से जाना जाता है, आज उन्हीं का अस्तित्व खतरे में है और इसका कारण हम स्वयं हैं।

जिस प्रकार से शहर में बहने वाले नालों ने असि का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया, अब उन्हीं नालों के बेरोक प्रवाह वरुणा को नाले में तब्दील करने में कोई कोताही नहीं बरत रहे। बदहाली तो यह है कि गंगा स्नान के लिए प्रसिद्ध काशी के गंगा में वरुणा के संगम के साथ यह बीमारी का अंबार भी लोगों तक पहुंच जाता है।

201 करोड़ रुपए की योजना के अंतर्गत 2016में वरुणा नदी के किनारे पर सौंदर्यीकरण का काम हुआ लेकिन नदी बचाने के कोई उपाय सामने नहीं आए। 2014में मां गंगा के बुलाने पर प्रधानमंत्री वाराणसी तो आए लेकिन कचहरी के रास्ते आते जाते भी वरुणा पर उनकी दृष्टि नहीं पड़ी।

घाटों की सुंदरता बनाए रखने के लिए कुछ समय पूर्व इसमें पानी भी छोड़ा गया लेकिन इससे उसकी आत्मा नहीं बची और उसकी दशा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। वरुणा पुल के नीचे बने घाट पर सुबह शाम टहलने वालों का जमावड़ा लगता था,बच्चे खेलने को यहां आते लेकिन वरुणा के पानी को छूकर आती हवा से किसी का भी दम घुटने लगता।

वर्तमान में अगर वरुणा का स्वरूप देखना है तो यह मात्र एक मौसमी नदी के रूप में बची है जो केवल बारिश और बाढ़ के पानी पर आश्रित है। कभी जनमानस की जीवनदायनी बनी वरुणा में अब मृत पशुओं के लाशों का अंबार है। वह वरुणा जिसका उल्लेख बुद्ध ने किया, जयशंकर प्रसाद ने वरुणा को पंक्तिबद्ध किया,आज वह अपना ही जीवन बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।

कालिदास की महान रचना मेघदूतम जिसमें नदियों द्वारा विकसित संस्कृति का विस्तृत वर्णन है, वहां पौराणिक मान्यता प्राप्त नदियों को अपनी पहचान के लिए गुहार करनी पड़ रही है।

कहा जाता है कि रावण के वध के बाद श्रीराम ने वरुणा के तट पर ही भगवान शिव की आराधना की जिससे यह रामेश्वर तीर्थ के रूप में जाना गया। उसके बाद वरुणा शिव से वंदनीय गंगा में विलीन हो जाती है।  इस प्रकार वरुणा राम और शिव के बीच माध्यम के रूप में देखी जा सकती है।

यह हमारी विस्मिता को भी दर्शाती है कि जब हम छोटी छोटी क्षेत्रीय नदियों को नहीं संजो पा रहे हैं, जिसमें बेधड़क वाराणसी के 17 किमी. की दूरी में 31नाले बह रहे हैं। वहां गंगा जैसी बड़ी नदी को बचाने के लिए नमामि गंगे जैसी योजनाएं कितनी फलीभूत हो पाएंगी या हो रही होंगी!

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