तीन दिन तक अकेले चीनी सेना से लड़ने वाले राइफलमैन जसवंत सिंह की कहानी

मौत के 58 साल बाद भी सेना द्वारा किया जाता है प्रोमोशन

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उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, इसके अतिरिक्त उत्तराखंड की जो पहचान है वो ये कि यहां से देश की सेवा के लिए सैनिक बहुत ज्यादा मात्रा में निकलते हैं। उत्तराखंड के चमोली से निकलने वाले एक सैनिक की कहानी इतनी अद्भुत हुई कि उसकी बहादुरी की मिसाल आज भी दी जाती है। यह कहानी है 1962 चीन युद्ध के दौरान अद्भुत पराक्रम दिखाने वाले राइफलमैन “जसवंत सिंह रावत” Jaswant Singh Rawat की। जिन्होंने 3 दिनों तक अकेले चीनी सेना का सामना किया और लगभग 300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतारा। जसवंत सिंह रावत को मौत के 58 साल बाद भी शहीद घोषित नहीं किया है, बल्कि उनके नाम का एक मंदिर बनाया है। हर साल उनको सालाना छुट्टी पर भेजा जाता है और समय-समय पर उनकी पदोन्नति भी की जाती है।

कौन हैं जसवंत सिंह रावत?

19 अगस्त 1941 को उत्तराखंड के ग्राम-बाड्यूं , ब्लाक-बीरोखाल, जिला-पौड़ी गढ़वाल में गुमान सिंह रावत के घर जन्मे जसवंत सिंह रावत बचपन से ही सेना के प्रति काफी आकर्षित रहते थे। वह जब पहली बार सेना में भर्ती होने के लिए गए तो उन्होंने भर्ती प्रक्रिया पूरी पास कर ली थी, पर उन्हें सेना में इसलिए उस वक़्त नहीं लिया गया क्योंकि तब वह सिर्फ 17 साल के थे। जैसे ही उनकी उम्र फौज के लायक हुई वह फौज में चले गए।

72 घण्टे अकेले सेना से लड़े

1962 में जब चीनी सेना के साथ भारत का युद्ध चल रहा था तो अरुणाचल प्रदेश के नूरानांग में गढ़वाल राइफल्स   Garhwal Rifles की टुकड़ी तैनात थी। जब सामने से चीनी सैनिकों की आने का आभास हुआ तो गढ़वाल राइफल्स के कमांडर को एहसास हुआ कि उनके पास पर्याप्त सैनिक और पर्याप्त हथियार नहीं है, जिस वजह से उन्होंने पीछे हटने का फैसला किया पर तीन सैनिक राइफलमैन जसवंत सिंह रावत, लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी, राइफलमैन गोपाल सिंह गुसाईं ने वहीं रुकने का फैसला किया। बाद में जसवंत ने अपने दोनों साथियों को वापस भेज दिया और खुद अकेले वहां रह गए।

उन्होंने सभी राइफल और मशीन गनों को ऐसे लगाया कि एक के बाद दूसरी बंदूक से फायर करते थे। जिस वजह से चीनी सेना को लगा कि वहां पूरी एक सैन्य टुकड़ी है। इसी धोखे में आकर चीनी सेना आगे नहीं बढ़ी और जसवंत सिंह रावत ने एक-एक कर चीन के लगभग 300 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। अद्भुत युद्ध के दौरान उसी क्षेत्र की दो जनजातीय महिलाएं सेला और नूरा जसवंत सिंह रावत के लिए खाना पहुंचाया करती थी, जिसके सहारे जसवंत वहां लड़ता था। एक दिन जब चीनी सेना ने सेला और नूरा को मदद ले जाते हुए देख लिया तो सेला को मार दिया और नूरा को बंदी बना लिया। जब जसवंत को लगा अब वो नहीं बच पाएगा तो उसने खुद को गोली मारकर अपनी जान ले ली। वहां आज भी दो पहाड़ियों के नाम दोनों बहनों सेला और नूरा के नाम पर रखे गए हैं।

चीनी सेना ने भी किया सम्मान

कहते हैं जब चीनी सेना को पता चला कि वहां 72 घंटों से सिर्फ एक सैनिक उन से युद्ध कर रहा था तो वह जसवंत सिंह रावत की वीरता देखकर काफी प्रभावित हुए। उस वक्त तो उसका गला काट कर उसका सिर अपने साथ ले गए, लेकिन बाद में उन्होंने जसवंत सिंह रावत का सिर वापस किया और जसवंत सिंह रावत की एक मूर्ति बनाकर भी भारतीय सेना को भेंट की। जो वहीं नूरानंग में स्थित जसवंतगढ़ में रखी गई है। जसवंत सिंह रावत के नाम पर मंदिर की स्थापना स्थापना की गई है जिसे जसवंतगढ़ कहा जाता है। वहां उनकी सारी चीजें रखी गई हैं।

रोज कपड़े, जूते चमकाए जाते हैं

जसवंत सिंह रावत के बारे में कहना है कि वह अभी भी जिंदा हैं। जब भी वहां पर कोई जवान ड्यूटी के दौरान सोने लगता है तो जसवंत उसे थप्पड़ मार कर जगा देते हैं। रोज सुबह जसवंत के कपड़े इस्त्री किए जाते हैं और उनके जूते पॉलिश किए जाते हैं। सुबह का खाना, चाय सबसे पहले जसवंत के कमरे में पहुंचाया जाता है। अभी भी माना जाता है कि वह जिंदा हैं और सेना की सैनिकों की देखभाल कर रहे हैं।

मौत के 58 साल बाद भी उनके नाम के आगे शहीद नहीं लगाया गया है। हर साल उनके परिवारजनों की तरफ से उनकी सालाना लीव एप्लीकेशन लगाई जाती है, जिसके बाद उनके परिजन अपने साथ उनकी फोटो को उनके पैतृक गांव ले जाते हैं, और छुट्टी खत्म होने पर उसे वापस वही पहुंचा दिया जाता है। हर महीने की तनख्वाह भी उनके परिवार वालों को मिल जाती है। नियमित अंतराल के दौरान जसवंत को पदोन्नति दी जाती रही है, इस समय वह मेजर जनरल के पद पर हैं।

 

– Jugal Kishor

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