BHU:फणीश्वर नाथ रेणु शताब्दी वर्ष पर दो दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन

वसंत महिला महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा किया गया आयोजन।

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काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के संबद्ध कॉलेज वसंत महिला महाविद्यालय(Vasanta College for Women) के हिंदी विभाग द्वारा शताब्दी वर्ष में रेणु:सृजन और संदर्भ विषयक पर दो दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया।मुख्यतः यह वेबीनार सेलुलाइड से फंतासी आता है आखर से यथार्थ और रेणु में आखर का यथार्थ है।रेणु का साहित्य विकास और वृद्धि के वैचारिक भेद को बताता है। इस विषय पर केंद्रित रहा।

उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय,गुजरात के कुलपति प्रोफेसर रामशंकर दुबे जी ने अपने उद्बोधन में रेणु के विस्तृत चिंतन की चर्चा करते हुए कहा कि रेणु भारतीय आत्मा के चिंतन के कथाकार हैं।क्रांति ,आंदोलन में उनकी भागीदारी ने उनके साहित्य को व्यापक फलक दिया।

वहीं अध्यक्षता करते हुए आईआईटी के निदेशक प्रोफेसर प्रमोद कुमार जैन ने नई शिक्षा नीति की बात करते हुए लोक भाषा के संरक्षण की बात की।महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ अलका सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया।  कार्यक्रम की संयोजक ने शताब्दी वर्ष में रेणु के साहित्यिक अवदान की चर्चा की।

सत्र

प्रथम मुख्य सत्र में प्रसिद्ध कथाकार प्रेम कुमार मणि ने कहा कि रेणु सुघर व्यक्तित्व के स्वामी थे।ऐसा व्यक्तित्व जिसका चिंतन और व्यव्हार एक हो अब संभव नहीं।इनर डेमोक्रेसी कैसे बची रहेगी इसकी चिंता रेणु ने की।राजनीतिक आजादी से बड़ी आजादी के मायने रेणु ने समझाए।

दूसरे प्रमुख वक्ता जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के अनुवाद विभाग के प्रोफेसर और लेखक देव शंकर नवीन ने कहा कि साहित्य जब कभी लिखा जाता भाषा में लिखाजाता है।रेनू ने अपनी ट्रेल में संगीत,नाच, ध्वनि की प्रयुक्तियों का प्रयोग कर अंचल को जीवित कर दिया।

द्वितीय सत्र में अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंदी के प्रीफेसर कमलानंद झा ने रेनू के कथन कि हम तो जुलूस लेकर चलेंगे कोई लाठी मारे तो मारे।उन्होंने कहा कि जो महत्व गांधीजी के लिए अफ्रीका का है वही महत्व रेणु जी के लिए नेपाल का है। प्रमुख वक्ता डॉ आशीष कंधवे सह संपादक गगनांचल,भारतीय विदेश विभाग ने रेनू के राष्ट्र निर्माण और उनके चिंतन पर अपनी बातें कही।

तीसरे और अंतिम वक्ता के रूप में दिल्ली के लोक संस्कृति के चिंतक और संस्कृतिकर्मी डॉ कैलाश कुमार मिश्र ने मानवविज्ञान के संदर्भ में एथनोग्राफिकेल ,नेटिव इंटेलिजेंस की बात की। अध्यक्षता वरिष्ठ कवयित्री, प्रोफेसर चन्द्रकला त्रिपाठी , तथा डॉ शशिकला त्रिपाठी ने की।उद्घाटन सत्र का सञ्चालन डॉ मीनू अवस्थी ने किया और प्रथम सत्र का डॉ बन्दना झा तथा तृतीय सत्र का डॉ राजेश चौधरी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ शशिकला त्रिपाठी ने किया।

दूसरे दिन का कार्यक्रम

विशिष्ट वक्ता के रूप में डॉ. सब्य साचिन (प्रिंसिपल, जी एस बी वी स्कूल, नई दिल्ली), डॉ. एस बी एन तिवारी (आर्यभट्ट कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय),इला कुमार (कवि, उपन्यासकार, अनुवादक, उपनिषदवेता, नई दिल्ली) के रूप में रहे।वहीं डॉ. पुनीत बिसारिया ने अध्यक्षता की।

प्रतिभागी के रूप में अपने शोध पत्र का वाचन नीरज झा ने रेणु के लोक साहित्य और उनकी भाषा,निशा ने ‘कथेतर गद्य की दृष्टि से रेणु के साहित्य का वैशिष्टय’, विषय पर अपने शोधपत्र का वाचन किया। साथ ही संचालन डॉ. सीमा पाण्डेय एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राजेश चौधरी ने किया।

 

1:30 बजे तक ‘प्रमुख सत्र’ का आयोजन किया गया।सत्र की अध्यक्षता डॉ. बाला लाखेंद्र (पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, BHU वाराणसी) ने की।विशिष्ट वक्ता के रूप में प्रो. सुभाषचंद्र राय (प्रोफ़ेसर हिंदी विभाग, विश्वभारती शांतिनिकेतन, पश्चिम बंगाल),प्रो. प्रमोद मीणा (प्रोफेसर हिंदी विभाग, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी, बिहार),अनंत जी (पत्रकार रेणु के अध्येता, फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादक, पटना) रहे। वहीं सत्र का संचालन रश्मि सिंह और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सीमा पाण्डेय ने किया।

वेब-संगोष्ठी के समापन सत्र के मुख्य अतिथि प्रोफ़ेसर रजनीश शुक्ल कुलपति,महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय,वर्धा थे और अध्यक्ष के रूप में प्रोफेसर उमापति दीक्षित,अध्यक्ष, नवीकरण विभाग,केंद्रीय हिंदी संस्थान थे।महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. अलका सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया।

दो-दिवसीय राष्ट्रीय वेब-संगोष्ठी की व्यवस्थित रिपोर्ट डॉ. मीनू अवस्थी(एसोसिएट प्रोफेसर,हिंदी विभाग,वसंत महिला महाविद्यालय) ने प्रस्तुत की।संगोष्ठी की परिकल्पना एवं उसके क्रियान्वन के लिए सजग एवं तत्पर रहने वाली डॉ. बंदना झा, संगोष्ठी-संयोजक एवं एसोसिएट प्रोफेसर,हिंदी विभाग,वसंत महिला महाविद्यालय ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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