‘दिल बेचारा’, रिव्यू नहीं श्रद्धांजलि

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दिल से सोचने वाले सुशांत सिंह राजपूत ने ‘दिल बेचारा’ (DIL BECHARA)से एक बार फिर जीता दर्शकों का दिल…..फिल्म शुरु होने के साथ ही उनकी मासूमियत भरी मुस्कुराहट को देखकर दिल ने एक बार फिर कहा…चल झूठे…सुशांत कभी मर नहीं सकता…सुशांत की ये मुस्कुराहट सालों साल लोगों के दिलो दिमाग में जिंदा रहेगी।

सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) का यूं अचानक से चले जाना…और फिर उनकी आखिरी फिल्म दिल बेचारा का बेसब्री से इंतजार करना, मानों सुशांत को आखिरी बार हंसते मुस्कुराते, गुदगुदाते देखने का एक जरिया हो।

अब बात करते हैं दिल बेचारा की…तो इस फिल्म को न क्रिटिक्स की जरुरत है ना ही अच्छे, बुरे कमेंट्स की…इस फिल्म पर बात करना, सुशांत की एक्टिंग की चर्चा करना, उनके लिये एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

25 जुलाई को जब फिल्म ‘दिल बेचारा’ Disney Hotstar पर रिलीज हुई तो ऐसा लगा जैसे फिल्म हाउसफुल हो गई हो, HOTSTAR का क्रैश होना इस बात का सबूत है। साथ ही सुशांत के फैन्स के लिए ये फिल्म एक प्यारा तोहफा  था।

‘दिल बेचारा’…जो हंसाते, गुदगुदाते शुरू होती है और रुलाते हुए खत्म हो जाती है।  फिल्म का निर्देशन किया है मुकेश छाबड़ा (Mukesh Chhabra)ने। बतौर डायरेक्टर ये उनकी पहली फिल्म है। लीड रोल में सुशांत सिंह राजपूत के साथ हैं…संजना सांघी (Sanjana Sanghi) जिन्होंने इस फिल्म से डेब्यू किया है। सहायक कलाकारों में साहिल वैद, स्वस्तिका मुखर्जी और शास्वत चटर्जी हैं और गेस्ट अपीयरेंस के रूप में है सैफ अली खान।

दिल बेचारा थोड़ी-थोड़ी राजेश खन्ना की फिल्म आनंद और शाहरुख खान की कल हो ना हो कि भी याद दिलाती है। लेकिन ‘दिल बेचारा’ आपको जिंदगी जीने का फलसफा सिखा जाती है।

फिल्म की कहानी

फिल्म जमशेदपुर से शुरू होती है जहां किज्ज़ी बासु (संजना सांघी) जो कि थायराइड कैंसर से पीड़ित है और अपने आखिरी दिन गिन रही है। किज्ज़ी बहुत ही कम खुश होती है और तभी किज्जी की मुलाकात होती है एमैनुएल राजकुमार जूनियर उर्फ मैनी (सुशांत सिंह राजपूत) से।

मैनी भी कैंसर की वजह से अपना पैर गवां चुका होता है, लेकिन बावजूद इसके वह बहुत जिंदादिली से जिंदगी जीता है। मैनी से मिलने के बाद से किज्जी बासु खुश रहने लगती है। उसे जिंदगी जीने का जैसे मकसद मिल गया हो। धीरे-धीरे दोनो की दोस्ती प्यार में बदल जाती है।

किज्जी बासु का सपना होता है अपने पसंदीदा म्यूजिशियन अभिमन्यु वीर (सैफ अली खान) से मिलने का, उससे मिलने के लिए किज्जी,  मैनी और किज्जी की मां पेरिस जाते हैं। वहां से लौटकर मैनी (सुशांत) का कैंसर फिर से बढ़ने लगता है उसके बाद फिल्म इमोशनल मोड़ लेने लगती है और आखिर में इमैनुअल राजकुमार जूनियर उर्फ मैनी की मौत हो जाती है।
दिल में हमेशा के लिए बस गए सुशांत

इस फिल्म को देखकर कहीं ना कहीं दिल सोचने पर मजबूर हो जाता है कि क्या सुशांत को मालूम था कि ये उनकी आखिरी फिल्म साबित होगी। जितनी जिंदगी मिली है उसे जीभर कर जी लेना, जाते-जाते लोगों को जिंदगी जीने का फलसफा सीखा जाना। सुशांत ने बखूबी निभाया है।

सुशांत की एक और शानदार फिल्म

“दिल बेचारा” आधी फिल्म हंसाती है और कई सीन रुला भी देते हैं। खासकर फिल्म का लास्ट काफी इमोशनल है। फ़िल्म का संगीत ए आर रहमान ने दिया है जो फिल्म के साथ काफी बेहतरीन लगता है।

एक मिनट के कैमियो रोल को सैफ ने बेहतरीन निभाया है। संजना सांघी भी अपने रोल में काफी स्वीट लगी हैं और दर्शकों को खुद से जोड़ने में कामयाब रहीं। सहायक कलाकारों के हिस्से ज्यादा कुछ नहीं आया पर जितना आया काफी अच्छा है। वहीं मुकेश छाबड़ा का निर्देशन ठीक-ठाक है।

इस आर्टिकल के साथ सुशांत सिंह राजपूत को हमारी तरफ से श्रद्धांजलि

 

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